श्रमण भगवान् श्री महावीर स्वामी जी के अभिग्रह

नगरी-- कौशांबी | राजा-- शतानिक महारानी-- मृगवती | मंत्री-- सुगुप्त | मंत्रीपत्नी-- नंदा | श्रेष्ठी-- धनावह | श्रेष्ठिपत्नी-- मूला उपाध्याय-- तथ्यकंदी छडीदारविजया नगरी-- चंपा | राजा-- दघिवाहन | महारानी-- धारिणी | राजपुत्री-- वसुमती | कंचुकी-- संपुल

महारानी मृगावती और धारिणी दोनों राजाधिराज चेटक की पुत्रीयां थीं

पौषवदि प्रतिपदा  के दिन कौशांबी नगरी में श्रमण भगवान् श्री महावीर स्वामी जी ने द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा से मन में एक असंभव सा अभिग्रह यूं धारण किया था-- द्रव्य से- हाथ में ऐसा सूपडा पकड़ा हो जिसके कोणे में उडद हों क्षेत्र सेएक पांव घर की दहलीज के बाहर हो और एक अंदर काल सेभिक्षाचर निवृत्त हो चुके हों अर्थात् भिक्षाचरी का समय बीत चुका हो भाव सेजो मूलरूप से हो तो राजपुत्री मगर प्रस्तुत हो दासी के रूप में;  मस्तक मुंडा हुआ हो; हाथों और पांवों में बेडियां होंरो रही हो और तीन उपवास किए हुए होंऐसी कोई राजकन्या यदि मुझे वोहराएगी तो ही मैं उसके हाथों से आहार ग्रहण करूंगा, अन्यथा नहीं

मन में ऐसे अभिग्रह को धारण कर परमात्मा श्री महावीर स्वामी जी प्रतिदिन भिक्षा के लिए घर-घर जाया करते थे और अभिग्रह पूर्ण होता देख यूं ही वापिस लौट आते थे ध्यान में मग्न  रहते थे चार महीनों से अधिक दिन व्यतीत हो चुके थे सभी जनों के मन में चिंता थी |

एक दिन परमात्मा महामंत्री सुगुप्त के घर पधारे | नंदा ने अनेक कल्प्य भोज्य पदार्थ परमात्मा के समक्ष प्रस्तुत किए, वोहरने का आग्रह किया मगर परमात्मा वापस लौट गए नंदा परमात्मा के यूं प्रत्यावर्तन से दुःखी थीचिंतित थी, उसकी आँखों में आंसू थे | गृहस्वामिनी को यूं दुःखी देख दासी ने पूछास्वामिनीइस भिक्षुक के प्रत्यावर्तन से इतनी दुःखी-दुःखी क्यों हो मैं तो इन्हें प्रतिदिन यूं ही अपनी नगरी में कई घरों में भिक्षा के लिए जाते आते हुए देखती हूं | लोग इनका स्वागत करते हैं, वोहराते हैं मगर ये तो कुछ भी लिए बिना यूं ही लौट आते हैं

कुछ ही देर में सहसा महामंत्री सुगुप्त घर पर आये उन्होंने अपनी पत्नी की परेशानीभरी स्थिति को देखा तो पूछा--  नंदा ! तू इतनी उदास, परेशान क्यों है तेरी आँखों में आंसू क्यों बता, क्या किसीने तेरी आज्ञा का अनादर किया है ?क्या किसीने तेरा अपमान किया है क्या मुझसे कोई गलती हुई है ?....  आदि

मंत्री जी ने एक साथ ऐसे अनेकों सवाल पूछ लिए | नंदा ने अपनी आँखों के आंसू पोंछे और कहा तो किसीने मेरा अपमान किया है,  न ही किसीने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है | आपसे तो गलती की कोई संभावना ही नहीं | फिर क्या बात है इतना दु:खी होने की ?

नंदा ने कहाआज अभी कुछ देर पहले आहार के लिए परमात्मा श्री महावीर स्वामी जी अपने घर पधारे थे मैंने उन्हें बहुत सारे प्रासुक, कल्प्य भोज्य और पेय पदार्थ दिखलाए,  मैंने आग्रह किया मगर उन्होंने कुछ भी तो नहीं लिया; मात्र देखा और लौट गए अरे,  ये तीर्थंकर होने वाले हैं | इनका अपने घर में आना ही सौभाग्य है, मगर मैं इन्हें वोहरा सकी, पारणा करवा सकी, यही मेरा दुर्भाग्य है | मात्र इतना ही दुःख है मुझे | मुझे तो यह भी पता लगा कि वे प्रतिदिन अपनी नगरी में गोचरी-भिक्षा के लिए घर-घर जाते हैं मगर कुछ भी ग्रहण नहीं करते मैं मानती हूं कि उन्होंने जरूर मन में कोई अभिग्रह धारण किया है जो कि पूरा नहीं हो पाया है, नहीं हो पा रहा है | मैं आपसे आग्रह कर रही हूं कि आप उनका अभिग्रह जानें और अभिग्रह पूरा भी करवाएं | यदि आप नहीं जान पाए तो देखते ही दूसरे के अभिप्रायों को जान लेने वाली आपकी बुद्धि का कोई फायदा नहीं इतना सुनते ही  मंत्री ने कहानंदा, तू चिंता छोड़ । कल प्रातःकाल से ही प्रयास चालू कर दूंगा नंदा और सुगुप्त की बातें महारानी के द्वारा कार्यवशात् प्रेषित छडीदार विजया ने सुनी थीं अतः वापिस जाकर उसने वे बातें ज्यों की त्यों महारानी जी को कहीं तो महारानी जी भी चिंतित हो गईं व्यग्र मन से विचार कर ही रही थीं कि महाराजा श्री शतानिक महारानी श्री मृगावती जी के पास आए राजा ने चिंता का कारण जानना चाहा तो रानी ने कहाराजन् ! तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी जी अपने इस नगर में हैं और उन्होंने अपने मन में कोई अभिग्रह धारण किया हुआ है इसलिये वे प्रतिदिन घर-घर जाते हैं भिक्षा के लिए, मगर अभिग्रह के अनुसार स्थितियां देखकर वापिस लौट जाते हैं | यही मेरी चिंता है आपको तो यह भी पता नहीं कि परमात्मा अपनी नगरी में हैं यह मेरा, आपका और अमात्य का प्रमाद है   अरे, राजा तो ऐसा होता है कि महल में रहकर भी गुप्तचरों के माध्यम से अपने प्रदेश के सिवाय धरती के चप्पे-चप्पे की जानकारी रखता है

राजा ने कहा-- तुझे धन्यवाद तूने मुझे योग्य समय पर चेताया | अब तक के प्रमाद के लिए मैं क्षमा चाहता हूं मगर कल प्रातःकाल से ही मैं पहले उनका अभिग्रह जानने का और बाद में अभिग्रह पूर्ण करवाने का शीघ्रातिशीघ्र प्रयास करूंगा |

प्रातःकाल राजा ने महामंत्री जी को बुलवाया और कहा-- तुझे और मुझे धिक्कार है कि अपनी नगरी में लगभग पांचेक मास से परमात्मा श्री महावीर स्वामी जी हैं, घर घर में गोचरी के लिए जाते हैं, मगर आहार लिये बिना यूं ही लौट जातें है | यह अपने लिए बहुत दुःख की बात है, चिंता का विषय है |

लगता है कि उन्होंने अपने मनमे कोई अभिग्रह धारण किया है | अपन जान ही नहीं पाए हैं तो फिर पारणा करवाने की कल्पना कैसी ?

अब क्या किया जाय ?

मंत्री ने कहाराजन् ! अपन कोई प्रयास करते हैं सुगुप्त महामंत्री ने एक सुझाव दिया जिसे सुनते ही राजा ने धर्म-शास्त्रों के वि5

चक्षण उपाध्याय तथ्यकन्दी को बुलवाया और परमात्मा के अभिग्रहों के सम्बन्ध में धर्मशास्त्रों में लिखित या श्रुत नियमों को समझना चाहा

उपाध्याय ने कहाराजन् ! विशिष्टज्ञान के बिना उनका अभिग्रह कोई भी नहीं जान पायेगा अपनी नगरी में उनके सिवाय ऐसा कोई भी विशिष्ट ज्ञानी महापुरुष नहीं है जिसे पूछा जाए वे तो अपना अभिग्रह कभी कहेंगे ही नहीं यदि वे कह दें तो उनका अभिग्रह कैसा ?

काफी विचार-विमर्श के पश्चात् राजा ने नगर में घोषणा करवाई कि अपने घर में जब भी अभिग्रह धारण किये हुए श्री वीर प्रभु जी भिक्षा के लिये आयें तो उन्हें कल्प्य भिक्षा दें कोशिश करें कि उनका अभिग्रह शीघ्रातिशीघ्र पूर्ण हो जाय |

राजा की ओर से सूचना पाकर सभी जन अत्यधिक सावधानी बरतने लगे मगर अभी तक कोई भी परिवार परमात्मा का अभिग्रह पूर्ण नहीं करवा पाया था यूं ही दिन बीतते जा रहे थे

एक दिन भिक्षाचरी का समय व्यतीत हो चुका था श्रमण भगवान् महावीर स्वामी जी गृह प्रति गृह गोचरी के लिए भ्रमण करते हुए धनावह शेठ के घर पहुंचे उस समय घर की दहलीज के अंदर और बाहर एक-एक पाँव रखी हुई, हथकडियों से जकड़े हुए हाथों और पांवों वाली तीन-तीन दिनों की भूखी प्यासी,  मुंडितमस्तका दासी चन्दनबाला अपने पालक पिता धनावह शेठ के द्वारा पकड़ाए गये सूपड़े को हाथों में थामे,  आंखों में आंसू भरे यह सोच रही थी

अरे, कहां तो मेरी वो स्थिति जब मैं राजनंदिनी वसुमती कहलाती थी,  हमेशा सखियों के साथ रहती,  घूमती,  फिरती,   साधु साध्वियों के साथ धर्मचर्चा करती, मगर आज मेरी यह दासी जैसी स्थिति ? कहां तो वे मेरे शिर पर काले-कजरारे लंबे-लंबे केश और कहां आज मेरा यह मुंडित मस्तक कहां, तो वो स्थिति कि मैं भक्तिसभर दिल से इन हाथों से साधु-संतों को आहार देती थी मगर आज उन्हीं हाथों में ये हथकड़ियां ? सचमुच में मेरे कर्म बहुत ही विचित्र हैं यदि विचित्र होते तो क्या कभी मेरी ऐसी अकल्प्य स्थिति होती ?  आज तीन-तीन उपवास के पारणे के समय मेरे पास सूपडे में ये उड़द के बाकुले ? आज यदि मैं घर पर होती तो जरूर किसी महात्मा को पहले वोहराती और फिर पारणा करती, मगर आज ऐसी स्थिति में हूं कि मात्र कल्पना ही कर सकती हूं कि यदि कोई साधु महात्मा पधार जाएं तो .... तो मैं उनको वोहरा दूं और फिर पारणा करूं .... ऐसा विचारते-विचारते ज्यों ही उसने सामने देखा तो परमात्मा श्री महावीर स्वामी जी उसके सामने खड़े थे और उसे देख रहे थे

चंदना ने विचाराअहो, अहो, कैसा यह मेरा पुण्यसंचय कि ऐसे समय ये मुनि मेरे घर पधारे   अहो, अहो, धन्य है मेरा सौभाग्य ... ऐसा सोचते-सोचते तो उसकी आंखों से आंसु ढल पड़े बेडियों के कारण दहलीज को लांघने में असमर्थ थी   वहीं खड़े-खड़े बोली-- हे प्रभु ! यद्यपि यह आहार उचित नहीं है फिर भी आप मुझ पर कृपा करो   आप परोपकारी हैं,  मुझ पर अनुग्रह करो

द्रव्य, क्षेत्र काल और भाव की अपेक्षा से अपना अभिग्रह पूर्ण जानकर परमात्मा ने अपने हाथ उसके सामने पसार दिए   उस समय 'अहो-अहो, मैं धन्य, धन्य हो गई, चंदना ने सूपड़े के एक कोने में रखे हुए उड़द के बाकुले परमात्मा को वोहरा दिये |

प्रभु के अभिग्रह को पूर्ण जानकार देवताओं ने वहां पांच दिव्य प्रकट किये अर्थात् वसुधारा-साढ़े बारह करोड़ स्वर्ण-मुद्राओं की बरसात की चेलोत्क्षेप-दिव्य वस्त्र बरसाए गंधोदकवृष्टि-सुगन्धित जल बरसाया   दुंदुभिनाद -दुन्दुभियां बजाईं अहो दानम्, अहो दानम् का उद्घोष किया गगन में ही अदृश्य रूप से देव, देवियां नाचे चंदनबाला के द्वारा दिए गये दान की देव, देवियों ने भूरि-भूरि अनुमोदना की तत्क्षण चंदना की बेडियां टूट गयीं, चंदना के मस्तक पर पूर्व की भांति केशपाश लहलहाने लगा भक्त देवों ने अपनी शक्ति से चंदनबाला के तुरंत वस्त्र बदल दिए, अलंकार ही अलंकार पहना दिए

दुन्दुभि की ध्वनि सुनकर हजारों- हजारों प्रजाजन धनावह शेठ के घर पर उमड़ पड़े सब जन पुलकित थे  सभी जन चंदनबाला के भाग्य को सराह रहे थे उपस्थित व्यक्तियों में राजा और रानी भी थेमंत्री और मंत्रीपत्नी भी थे और सम्पूल दास भी था सब जन प्रसन्न थे मगर संपुल फूट-फूट कर रो रहा था सब जन आश्चर्य से उसे देख रहे थे शतानिक राजा ने उसे पूछाअरे, इन खुशी के क्षणों में तू इस रीति से क्यों रो रहा है ?

सम्पुल ने कहामहाराज ! पारणा करवानेवाली इस वसुमती को देखकर मैं चुप नहीं रह पाया, चुप रह भी नहीं पाऊंगा महाराज,  कहां तो इसके वो दिन और कहां आज इसके ये दिन ?

 राजा ने पुछाक्या, तू इसको जानता है ?

सम्पुलने कहा-- हांमैं इसे बहुत अच्छे ढंग से जानता हुं | यह मेरे स्वामी राजाधिराज दधिवाहन की पुत्री है और मैं दधिवाहन राजा का कंचुकी हूँ जब आपने चम्पा नगरी को लूटा था तब वहां से राजा श्री दधिवाहन जी तो भाग गये थे मगर आपके एक सैनिक ने राजमहालय में लूटते हुए महारानी धारिणी और वसुमती को पकड़ लिया था   ज्यों ही उसने अपने ऊंट पर दोनों को बिठाने के बाद कहा कि मैं महारानी को तो अपनी पत्नी बनाऊंगा त्यों ही महासती धारिणी देवी ने अपने प्राण छोड़ दिए जबकि इसे उसने अपनी पुत्री के रूप में आश्वस्त किया मगर उसने इस नगरी में राजकुमारी वसुमती को बेच दिया और आज राजकुमारी वसुमती यहां दासी के रूप में है मुझे इस बात का बड़ा दुःख है,  शोक है

संपुल की बातें सुनते ही राजा ने कहाहे भद्र,  अब तो यह कुमारी शोक करने योग्य नहीं है यह तो परम सौभाग्यशालिनी है अरे,  यदि हममें से सबसे अधिक किसीका सौभाग्य है तो मात्र इसका इसने परमात्मा को पारणा करवाया है हम सबकी चिंता को टालने वाली एकमात्र यही है

उसी समय महारानी मृगावती ने कहाअरे, क्या यह धारिणी की बेटी है धारिणी तो मेरी सगी बहन है, उसकी पुत्री तो यह मेरी ही पुत्री है  |

प्रभु पारणे के पश्चात् मौन पूर्वक आगे बढ़ गए  (त्रिषष्टिश्लाकापुरुषचरित्र पर्व 10, सर्ग 4 )

कथ्य

कर्मण की गति न्यारी असंभाव्य भी संभव और संभाव्य भी असंभव हो जाता है । राजकुमारी भी दासी बन सकती है और दास राजा बन सकता है ।

अकल्प्य रूप से कभी दुर्भाग्य सौभाग्य के रूप में तो सौभाग्य दुर्भाग्य के रूप में परिवर्तित हो सकता है दुराशय से अशुभ के रूप में की गई घटना का शुभ परिणाम भी सकता है

जिनेंद्र भगवंत की तपस्या एवं पारणे का आनंद देवेंद्र, देव देवियां, मानव भी मनाते हैं

देवता जन अपनी-शक्तियों से मनचाहा कभी भी कहीं पर भी कर सकते हैं

अभिग्रह अर्थात् प्रतिज्ञा-विशिष्ट संकल्प अभिग्रह अपने मन में ही धारण किया जाता है, कभी भी किसीको बताया नहीं जा सकता अभिग्रह चार प्रकार-द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा से धारण किया जा सकता है जैसे1. द्रव्य से-- जो ग्राह्य द्रव्य-पदार्थ हो वो अमुक हो, ऐसा-ऐसा हो आदि 2. क्षेत्र सेइस ग्राम में हो या अन्य अमुक ग्राम में हो,  या अमुक स्थान पर हो; क्षेत्र में ऐसी-ऐसी स्थिति हो 3. काल सेअमुक प्रहर, पूर्वाह्न, अपराह्न आदि समय की अपेक्षा से 4. भाव सेगान, हास्य, रुदन आदि अमुक-अमुक स्थितिया     a