शब्द मंत्र समान है । शब्द ही आभूषण है ।

 

संग्राहकः आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय समुद्र सूरीश्वर जी महाराज

अनुवादकः आचार्य श्रीमद् विजय धर्मधुरंधर सूरीश्वर जी महाराज

 

जीवदयाइं रमिज्जइ, इंदियवग्गो दमिज्जइ सयावि

सच्चं चेव चविज्जइ, धम्मस्स रहस्समिणमेव ।। उपदेशरत्नमाला 2 ।।

रहस्य मात्र इतना ही किसदा जीवों के प्रति दयाभाव रखो; इन्द्रियों का दमन करो; और सत्य धर्म का बोलो |

सीलं हु खंडिज्जइ, संवसिज्जइ समं कुसीलेहिं

गुरुवयणं खलिज्जइ, जइ नज्जइ धम्मपरमत्थो ।। उपदेशरत्नमाला 3 ।।

जो विकट विषम संयोगों में भी कभी शील-सदाचार का खंडन नहीं करता; कुशील--दुराचारी व्यक्तियों का संग नहीं करता: और गुरु के वचनों का कभी भी अनादर नहीं करता; ऐसे व्यक्ति ने ही धर्म के परमार्थ  को जाना है  |

चवलं चंकमिज्जइ, विरज्जइ नेव उब्भड़ो वेसो

वंकं पलोइज्जइ, रुट्ठा वि भणंति किं पिसुणा ? ।। उपदेशरत्नमाला 4 ।।

जो चपलता-तेजी से चलता नहीं; उद्भट वेष पहनता नहीं; और वक्रदृष्टिमलिन और दुष्ट आशय से किसीको देखता नहीं; ऐसे व्यक्ति के संदर्भ में रूठे हुए चुगलखोर भी क्या कह सकेगें ?

नियमिज्जइ नियजीहा, अवियारियं नेव किज्जए कज्जं

कुलक्कमो लुप्पइ, कुविओ किं कुणइ कलिकालो ।। उपदेशरत्नमाला 5 ।।

जो स्वयं की जबान पर नियमन रखता है; बिना विचारे कार्य नहीं करता; और अपनी कुलपरंपरा का लोप नहीं करता; ऐसे व्यक्ति का क्रुद्ध कलिकाल भी कुछ नहीं बिगाड़ पाता

मम्मं उलविज्जइ, कस्सवि आलं दिज्जइ कयावि

को वि उक्कोसिज्जइ, सज्जणमग्गो इमो दुग्गो ।। उपदेशरत्नमाला 6 ।।

सज्जनों की यह जीवननीति तो बहुत ही कठिन है-- किसीके लिए कभी भी मर्मघातक वचन बोलनाकिसी पर झूठा आरोप नहीं लगाना; और किसी पर कभी भी आक्रोश करना |

सव्वस्स उवयरिज्जइ, पम्हसिज्जइ परस्स उवयारो

विहलं अवलंबिज्जइ, उवएसो एस विउसाणं ।। उपदेशरत्नमाला 7 ।।

सभी विद्वानों का यही उपदेश है-- जीवों पर उपकार करो; दुसरों के उपकार को कभी भूलो मत; और विह्वल-दुःखी व्यक्ति को सहारा दो |

को वि अब्भत्थिज्जइ, किज्जइ कस्सवि पत्थणाभंगो

दीणं जंपिज्जइ, जीविज्जइ जाव जीअलोए ।। उपदेशरत्नमाला 8 ।।

संसार में जब तक जीना है तब तक जीओ मगर कभी भी किसीसे याचना मत करोकिसीकी उचित मांग का भंग मत करो; और मुख से दीन वचन मत बोलो |

अप्पा पसंसिज्जइ, निंदिज्जइ दुज्जणो वि कयावि

बहु बहुसो हसिज्जइ, लब्भइ गुरुअत्तणं तेण ।। उपदेशरत्नमाला 9 ।।

यदि गुरुता पाना चाहते हो तो कभी भी खुद की प्रशंशा मत करो;  दुर्जन की निंदा मत करो; और निष्कारण अधिक मत हंसो |

रिउणो वीससिज्जइ, कयावि वंचिज्जए वीसत्थो

कयग्घेहिं हविज्जइ, एसो नायस्स नीसंदो ।। उपदेशरत्नमाला 10 ।।

नीति का सार मात्र इतना ही कि शत्रुओं पर कभी भई विश्वास मत करोविश्वासु को कभी भी ठगो मत;  और कभी भी कृतघ्न मत बनो अर्थात् उपकारी के उपकार को कभी भी भूलो मत |

रज्जिज्जइ सुगुणेसु, बज्झइ राओ नेहवज्जेसु

किज्जइ पत्तपरिक्खा, दक्खाण इमो कसवट्टो ।। उपदेशरत्नमाला 11 ।।

चतुर व्यक्तिओं की यही कसौटी है कि वे सद्गुणियों के प्रति राग और  स्नेहहीन व्यक्तिओ के प्रति विराग रखते हैं; और पात्र की परीक्षा करते रहते हैं |

नाकज्जमायरिज्जइ, अप्पा पाड़िज्ज न वयणिज्जे ।

न य साहसं चइज्जइ, उब्भिज्जइ तेण जगहत्थो ।। उपदेशरत्नमाला 12 ।।

यदि जगत् में हाथ ऊंचे रखकर ही जीना है तो कभी अकार्य मत करो; कभी निंद्य कार्य मत करो; और साहस का कभी भी त्याग मत करो ।

वसणे वि न मुज्झिज्जइ, मुच्चइ नायो न नाम मरणे पि ।

विहवक्खए वि दिज्जइ, वयमसिधारं खु धीराणं ।। उपदेशरत्नमाला 13 ।।

धीर पुरुषों का असिधारा के समान यह कठोर नियम है कि वे दुःख आने पर भी कभी घबराते नहीं; मृत्यु के उपस्थित होने पर भी कभी न्याय का त्याग नहीं करते; और वैभव के क्षीण होने पर भी देते रहते हैं ।

अइनेहो न वहिज्जइ, रुसिज्जइ न अपिये वि पइदियहं । 

वद्धारिज्जइ न कली, जलंजली दिज्जइ दुहाणं ।। उपदेशरत्नमाला 14 ।।

प्रिय व्यक्ति पर अतिस्नेह मत करो; अप्रिय व्यक्ति पर हमेशा रोष-क्रोध मत रखो; और पारस्परिक कलह मत बढ़ाओ; इस रीति से तुम दुःखों को जलांजलि दे सकते हो ।

न कुसंगेण वसिज्जइ, बालस्स वि घिप्पए हि्अं वयणं ।

अनायाओ निव्वट्टिज्जइ, न होइ वयणिज्जया एवं ।। उपदेशरत्नमाला 15 ।।

यदि तुम कुशील-दुराचारी जनों के साथ नहीं रहते हो; बालक से भी हितवचन ग्रहण करते हो; और अन्याय से लौटते हो अर्थात् कभी भी किसीके प्रति अन्याय नहीं करते हो तो तुम्हारी निंदा कोई भी कभी नहीं कर सकता ।

विहवे वि न मच्चिज्जइ, न विसीइज्जइ असंपयाए वि ।

वट्टिज्जइ समभावे, न होइ रणरणइ संतावो ।। उपदेशरत्नमाला 16 ।।

यदि तुम संपत्ति प्राप्त करने पर भी गर्व नहीं करते हो; गरीबी प्राप्त होने पर विषाद नहीं करते हो; और दुःख या सुखभरे संयोगों में सदा समभाव से रहते हो तो तुम कभी भी संताप प्राप्त नहीं कर सकते  हो ।

वण्णिज्जइ भिच्चगुणो, न परुक्खं न य सुअस्स पच्चक्खं ।

महिसा उ नोभयावि हु, न नस्सए जेण माहप्पं ।। उपदेशरत्नमाला 17 ।।

कभी भी अपने नौकर के गुण उसके परोक्ष-पीठ के पीछे मत कहो; अपने पुत्र के गुण उसके प्रत्यक्ष-सामने मत कहो; और अपनी पत्नी के गुण तो उसके सामने और उसकी पीठ के पीछे मत कहो तो ही तुम्हारी महत्ता कभी नष्ट न होगी ।

जंपिज्जइ पियवयणं, किज्जइ विणओ अ दिज्जए दाणं ।

परगुणगहणं किज्जइ, अमूलमंतं वसीकरणं ।। उपदेशरत्नमाला 18 ।।

बिना मूल्य चुकाए और बिना साधना किए सिद्ध किया जा सकने वाला वशीकरण-मंत्र इतना ही कि सदा प्रिय वचन बोलो; विनय करते रहो; दान देते रहो; और दूसरों के गुणों को ग्रहण करते रहो ।

पत्थावे जंपिज्जइ, सम्माणिज्जइ खलो वि बहुमज्झे ।

नज्जइ स-परविसेसो, सयलत्था तस्स सिज्झंति ।। उपदेशरत्नमाला 19 ।।

जो व्यक्ति समयोचित-प्रसंग के अनुरूप बोलता है; अधिक व्यक्तियों के सामने भी दुष्ट को सम्मान देता हे; और स्वयं की तथा दूसरे की विशेषताओं को जानता है ऐसे व्यक्ति के सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं ।

मंत-तंताण न पासे गम्मइ, न परग्गहे अबीएहिं ।

पडिवण्णं पालिज्जइ, सुकुलीणत्तं हवइ एवं ।। उपदेशरत्नमाला 20 ।।

यदि तुम मांत्रिक और तांत्रिक व्यक्तियों के पास में नहीं जाते हो; अकेले दूसरों के घर पर नहीं जाते हो; और स्वीकृत प्रतिज्ञा का पालन करते हो तो तुम्हें स्वतः कुलीनता प्राप्त हो जाती है ।

भुंजइ भुंजाविज्जइ, पुच्छिज्ज मणोगयं कहिज्ज सयं ।

दिज्जइ लिज्जइ उचियं, इच्छिज्जइ जइ थिरं पिम्मं ।। उपदेशरत्नमाला 21 ।।

यदि प्रेम को स्थिर रखना चाहते हो तो प्रिय व्यक्ति के घर पर खाओ, पिओ और प्रिय व्यक्ति को अपने घर में खिलाओ, पिलाओ; उसके मनोगत भावों को पूछो और अपने मनोगत भाव उसे बताओ; प्रियजन को उचित वस्तु दो और उससे भी उचित वस्तु लो ।

को वि न अवमण्णिज्जइ, न य गव्विज्जइ गुणेहिं निअएहिं ।

न विम्हओ वहिज्जइ, बहुरयणा जेणिमा पुहवी ।। उपदेशरत्नमाला 22 ।।

अजी, यह पृथ्वी तो बहुरत्ना है अतः किसीका भी कभी अपमान मत करो; कभी भी अपने गुणों पर गर्व मत करो; और कभी भी आश्चर्य मत करो ।

आरंभिज्जइ लहुअं, किज्जइ कज्जं महंतमवि पच्छा ।

न य उक्करिसो किज्जइ, लब्भइ गुरुअत्तणं जेण ।। उपदेशरत्नमाला 23 ।।

गुरुता यूं प्राप्त की जा सकती है—प्रारंभ में छोटे-छोटे कार्य करो; तत्पश्चात् बडे-बडे कार्य करो और कभी भी गर्व मत करो ।

झाइज्जइ परमप्पा, अप्पसमाणो गणिज्जइ परो वि ।

किज्जइ न राग-दोसो, छिण्णिज्जइ तेण संसारो ।। उपदेशरत्नमाला 24 ।।

जन्म मरण रूप संसार का छेदन करना चाहते हो तो परमात्मा का ध्यान धरो; दूसरे को भी स्वयं

 के समान गिनो; और किसी भी संयोग में राग एवं द्वेष मत करो ।