व्यवहार का प्रभाव

 

ज्ञातनंदन श्रमण भगवान् श्री महावीर स्वामी जी विहार करते-करते एक गांव में पधारे | साथ में अनेकों मुनि जन थे परमात्मा ने गौतमस्वामी जी को कहागौतमगांव के बहार एक खेत है उस खेत में एक व्यक्ति हल चला रहा है तू उसके पास जा और उसे प्रतिबोध दे |

परमात्मा की आज्ञा पाकर श्री गौतमस्वामी जी उस किसान के पास गए और उससे पूछा-- अरे ! तू यह क्या कर रहा है ?

किसान ने कहा-- भगवन् ! मेरे भाग्य में खेती लिखी है अत: यह कर रहा हूँ |

गौतम स्वामी जी ने कहा-- अरे ! तू अपने भाग्य को संवार सकता है और यदि तू अपने भाग्य को संवार लेगा तो फिर तुझे इतनी हाड़मारी की कोई जरूरत नहीं रहेगी

भगवन् ,  मैं अपने भाग्य को कैसे संवार सकता हूं ?

धर्म आराधना से |

गणधर भगवंत ने विस्तार से धर्म का स्वरूप समझाया हालिक उनसे उपदेश सुनता रहा किसान को गणधर भगवंत की बातें जंची | आखिर उसने कहा-- मैं यह कार्य छोड़कर आपके कहे अनुसार धर्म आराधना के लिए तैयार हूँ | अभी आपने मुझे जो संयम-धर्म बताया है वह मुझे जंचा हैमैं उस धर्म के पालन के लिए सज्ज हूँ |

गौतम स्वामी जी ने उसे दीक्षा दे दी |

हालिक बहुत प्रसन्न था गणधर भगवंत गौतम स्वामी जी को गुरु के रूप में पाकर |

गौतम स्वामी जी ने कहा-- चलो, अब यहां से विहार करें |

नवदीक्षित मुनि ने पूछा-- अब कहां जाना है ?

गौतम स्वामी जी ने कहा-- मैं तुम्हें अपने गुरु जिनेश्वर भगवंत के पास ले चलता हूँ |

वे कौन हैं कैसे हैं ?

वे सर्वज्ञ हैं, सर्वदर्शी हैं | वे सभी जीवों के एकांतरूप से हितचिन्तक हैं | वे धर्मदेशक हैं, धर्मनायक हैंवे अतिशयवान् हैं, उनके ऐसे-ऐसे चौंतीस अतिशय हैं; और वाणी के ऐसे-ऐसे ३५ गुण तो वर्णनातीत हैं | वे अरिहंत कहलाते हैं क्योंकि उन्होंने आंतरिक कर्मशत्रुओं का हनन किया है; अपने पुरुषार्थ से उन पर विजय पाई है उन्होंने साधना करते-करते चार घातिकर्मों का क्षय किया है केवलज्ञान, केवलदर्शन को पाया है वे अर्हंत हैं यानि नर नारियों और चारों प्रकार के देव देवियों के द्वारा पूजे जाते हैं पशु पंछी भी उनका उपदेश सुनते हैं उनकी उपस्थिति से तो वे जन्मजात वैर-भाव को भी भूल जाते हैं उनके ऐसे-ऐसे आठ प्रातिहार्य हैं वे देवों के द्वारा बनाए गए ऐसे-ऐसे भव्य, दिव्य समवसरण में बैठकर धर्मदेशना देते हैं, जीवों को प्रतिबोध देते हैं .....  आदि |

चलो ! अब चलते हैं ऐसे अपने गुरु जी के पास, जाकर उन्हे वंदन करेंगे | स्वयं उन्होंने ही मुझे तेरे पास भिजवाया है

गुरुस्वरूप-परमात्मा के गुणों का वर्णन सुनते-सुनते किसान को बोधिबीज-सम्यग् दर्शन की प्राप्ति हो गई | और वह यह सोचते-सोचते गणधर भगवंत जी के साथ चल रहा था कि यदि ये मेरे गुरु जी इतने अच्छे हैं तो इनके गुरु जी कितने अच्छे होंगे चलो, उन्हें वंदन करने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है पहले ही दिन |

गुरु गौतम स्वामी जी के साथ ज्यों ही नवदीक्षित मुनि ने परमात्मा को दूर से देखा तो उसका चित्त गहरे विद्वेष से भर गयाक्रोध से उसके होंठ फड़फड़ाने लगे और उसने गणधर गौतम स्वामी जी को कहागुरु जी ! यदि ये तुम्हारे गुरु जी हैंयदि ये तुम्हारे धर्माचार्य हैं तो मुझे इनसे तो क्या तुमसे भो कोई मतलब नहीं है | ये लीजिये आपके धर्मोपकरण और  मुझे नहीं चाहिए तुम्हारी दीक्षा |

ऐसा कहते हुए तो उसने गणधर भगवंत को रजोहरण-ओघा और मुंहपत्ती सौंप दी और क्रोध से धम-धमाता हुआ चले गया वापिस अपने खेत |

गणधर गौतम स्वामी जी के सिवाय अन्य अनेक मुनिजन यह देखकर आश्चर्य प्रकट कर रहे थे कि यह हुआ क्या ऐसा हुआ क्यों ?

गौतम स्वामी जी ने प्रभु को नमन किया और पूछा-- हे भदंत ! भगवंत ! समग्रलोकवर्ती भव्य जीवों को दर्शन मात्र से आनंद देने वाले आप श्री जी को देखकर तो जन्मजात वैरी भी अपने वैरभाव को भूल जाते हैं, एक साथ रहते हैं मगर ऐसे आपको देखते ही यह वैरभाव से भर गयाआपके प्रति इतना विद्वेष कि यदि ये तुम्हारे धर्माचार्य हैं, गुरु हैं तो मुझे इनसे कोई मतलब नहींतुमसे भी कोई मतलब नहीं | साहेब ! वो चला गया | आश्चर्य है हम सबके दिलो-दिमागों में | ऐसा क्यों हुआ मेरे प्रति स्नेहराग और आपके प्रति इतना विद्वेषभाव क्यों ? आपको देखते ही उसने चरित्र छोड़ दिया, क्यों ?

 प्रभु ने कहा-- मैंने त्रिपृष्ठ वासुदेव के भव में बहुत बुरी तरह से जिस सिंह को मारा थायह वही जीव है मैंने इसके दोनों जबडों को पकड़ कर इसे फाड़ दिया था अत: मेरे उस व्यहार के कारण ही इसकी आत्मा में मेरे प्रति जो क्रोध, विद्वेष का संस्कार जमा था वह मुझे देखते ही जग गया और वह गुस्से से यूं तुझे, मुझे और चारित्र को छोड़कर भाग गया जबकि उस भव में तू मेरा सारथि था | क्रोध से फड़फड़ाते सिंह को तूने स्नेहिल मधुर वचनों से शांत किया था | अत:  तेरे प्रति उसके दिल में राग थाप्रेम था मैंने तेरे प्रति उसके स्नेह भाव को जानकर ही भेजा था तुमसे उसने बोधिबीज--सम्यग् दर्शन पा लिया |

गौतम, इतना ही क्यों कुछ बर्षों पहले छद्मस्थ अवस्था में मैं जब नौका में बैठकर गंगा नदी को पार कर रहा था तब यह सुदंष्ट्र नामक देव था इसने नभोमार्ग से जाते हुए नौका में बैठे हुए मुझे देखा था तब भी इसने नौका सहित मुझे नदी में डुबाने का प्रयास किया था वह बात जुदा कि यह हमें डुबा नहीं पाया था ।

कथ्य

सम्यग् दर्शन अर्थात् मुक्ति के प्रति अविरुद्ध, प्रशस्त भावदशा । सम्यग् दर्शन अर्थात् प्रशम, संवेग, निर्वेदादि स्वरूप आत्मधर्म । सम्यग् दर्शन अर्थात् संपूर्ण आत्मिक गुणों के अंशों का आत्मा से स्पर्श । सम्यग् दर्शन अर्थात् जिनेंद्र परमात्मा द्वारा प्रज्ञप्त तत्तवों पर अटल श्रद्धान । जैन आगम एवं आगमेतर प्रकरणादि अनेक ग्रंथों में सम्यग् दर्शन और मिथ्या दर्शन के संदर्भ में विशद और विस्तार से चर्चा प्राप्त है ।

तीर्थंकर परमात्मा के गुणों का श्रवण, स्मरण सम्यग् दर्शन की प्राप्ति का एक कारण बन सकता है ।

तीर्थंकर परमात्मा प्रत्येक आत्मा का एकांत रूप से हित-कल्याण ही चाहते हैं अतः वे स्वयं तो तदर्थ प्रयास करते ही हैं । हां, यदि वे किसी आत्मा के हित-कार्य में स्वयं को नहीं दूसरे व्यक्ति को उचित मानते हैं तो वे उसे उसकी आत्मा के हित के लिए भिजवाते हैं ।

किसीको देखकर राग और किसीको देखकर द्वेष यह पूर्वबद्ध कर्मों का परिणाम है और उन-उन कर्मों का मुख्य कारण है जीव का व्यवहार । निमित्त विशेष को पाकर भी वह कर्म उदय में आ सकता है ।

जीव ने जिस भव में कर्म बांधा हो उसी भव में उदय आए यह निश्चित नहीं । हां, निकाचित या सत्ता में रहा हुआ कर्म अवश्यमेव उदय में आता ही है, आएगा ही मगर वह कब यह छद्मस्थ के ज्ञान में निश्चित नहीं ।

धर्म की आराधना से भाग्य को संवारा जा सकता है ।

संलेखना अर्थात् आगमोक्त विधिपूर्वक शरीर, कषाय एवं कर्मों को क्षीण करना । संलेखना एक विशिष्ट तपःप्रक्रिया है । मरण से पूर्व आगमोक्त पद्धति से की जाने वाली अंतिम क्रिया ।