पाप की सजा ऐसी भी

 

दो मित्रों की कहानी है |

एक था राजपुत्र और दूसरा था कसाइपुत्र | राजपुत्र को गर्भावस्था से ही अहिंसा, सत्य, संयम,  तप,  त्याग, न्याय, नीति और कर्तव्यपरायणता के संस्कार मिले थे जबकि कसाइपुत्र को हिंसा,  लूट-पाट, माया, राग-द्वेष, क्रूरता, घृणा के | दोनों में रात और दिन जितना अंतर था मगर दोनों की दोस्ती पक्की थी |

राजपुत्र का नाम था अभयकुमार और कसाइपुत्र का सुलसकुमार | अभयकुमार के पिता जी का नाम था-- मगधनरेश श्री श्रेणिक-बिम्बिसार और सुलस के पिता का कालशौकरिक |

जब लोग अभय और सुलस को एक साथ घूमते-फिरते देखते, संगोष्ठियां करते देखते तो विश्वास ही न कर पाते थे कि सुलस कसाई कालशौकरिक का पुत्र है ।

श्रेणिक और कालशौकरिक के संदर्भ में एक बात प्रसिद्ध थी—

जब महाराजा श्रेणिक ने श्रमण भगवान् श्री महावीर स्वामी जी से स्वयं के लिए नरक गति में न जाने के उपाय पूछे थे तो परमात्मा ने कुछ उपायों में से एक उपाय यह भी कहा था कि तू कालशौकरिक से एक दिन के लिए हिंसा-कार्य छुडवा दे |

 श्रेणिक ने कालशौकरिक को बुलवाया और हिंसा-कार्य छोड़ने के लिए कहा, समझाया, मगर वह नहीं माना । क्रुद्ध श्रेणिक ने उसे बहुत गहरे खड्डे में उतरवा दिया न रहेगा बाँस और न बजेगी बाँसुरी, ऐसा सोच श्रेणिक ने उसे हिंस्य भैंसों से तो दूर रखने का उपाय किया मगर कालशौकरिक ने कुंए में रही मिट्टी से छोटे-छोटे पाँच सौ भैंसे बनाए । उसने अपने हाथ से ही बेहद क्रूरतापूर्वक उनकी गर्दन काट दी ।

श्रेणिक को जब यह जानकारी मिली तो वह बहुत निराश-निराश हो गया |

 राजा श्रेणिक ने पुनः कसाई की आँखों पर पट्टी बांधी,  हाथ-पांव जंजीरों से जकडे,  रस्सियों से बांधा और    उसे उसी गहरे कुंए में उतरवा दिया । मगर अब की बार उसने बेहद क्रूरता से मन ही मन पांच सौ भैंसे मारे और श्रेणिक को जानकारी मिली तो उसने भवितव्यता मानकर परमात्मा के वचनों को स्वीकार लिया |  राजा होने पर भी विवश था | लाचार था | अपनी नरकगति निवारण के लिये सब कुछ करना चाहता था,  कर सकता था, पर कर नहीं पा रहा था | कारण मात्र इतना ही कि निकाचित कर्मों का परिणाम तो भुगतना ही पडता है । दिन यूं ही बीत रहे थे ।

अचानक एक दिन सुलस ने अभयकुमार को कहा-- मित्र ! एक बहुत बड़ी समस्या है |

बोल मित्र, क्या समस्या है तेरी ।

 मेरे पिता जी बीमार हैं | लगता है कि उन्हें एक नहीं, अनेकों बिमारियां हैं |  उनकी वेदना असह्य है | मुझसे तो देखी नहीं जाती उनकी बेचैनी, पीड़ा,  तडपन,  लाचारी ... | उनके जितने-जितने भी उपचार कराता हूँ रोग शांत होने के बजाय दिन-दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ते ही जा रहे हैं | अब तो सब कुछ असाध्य ही हो चुका है ।  मैं उन्हें उनके अत्यंत पसंदीदा भोज्य, पेय पदार्थ देता हूं मगर वे देखना तक भी पसंद नहीं करते । उनके सामने  सुंदर गीत-गान, नाटक आदि करवाता रहता हूँ, मगर वे अपने कानों के छिद्रों में उंगलियां डाल देते हैं, आंखें बंद कर लेते हैं । उनकी शय्या पर सुगंधित पुष्प अदलाता बदलाता रहता हूं, मगर उन्हें कुछ भी तो नहीं सुहाता । सभी स्पर्शोपचार, गंधोपचार, तैलोपचार, औषधोपचार, यंत्र-मंत्र-तंत्रोपचारादि सब उपचार चालू हैं  मगर कोई भी लाभ नहीं, लाभ तो दूर बल्कि रोग फैलते ही जा रहे हैं.... | उनका रोना, चीखना-चिल्लाना, कराहना, डरना, कांपना आदि मेरे लिए तो अब सब कुछ असह्य हो चुका है,  सोचता भी हुँ तो दिमाग फटता है | दिल रोता हैं .... | इतने-इतने उपचार किए तो भी थोडा सा फायदा नहीं है, सुख नहीं है |

अभय ने कुछ सोचकर कहा—सुलस, तेरे पिताजी मरकर नरक में जाएंगे तब जाएंगे वहां जो वेदना भोगेगें तब भोगेगें मगर यहां तो यह उस वेदना की बहुत मामूली सी शुरुआत है | दूसरी बात कि उन्हें धातुविपर्यास हो चुका है अतः उनके लिए तो ये उपचार हैं ही नहीं । उनके सुख के लिए तू जैसे प्रयास-उपचार कर रहा है उनका उल्टा ही परिणाम आएगा ।  प्रत्येक रोग-दमन का उपाय नए-नए रोगों को पैदा करेगा | अतः अब तू उन्हें सरस नहीं नीरस से नीरस, संस्कृत नहीं बल्कि विकृत से विकृत भोज्य और पेय पदार्थ दे | मधुर नहीं कड़वे, तीखे, कसैले भोज्य, पेय पदार्थ दे | उन्हें मधुर गीत नहीं बल्कि कर्कश ध्वनियाँ  सुनवा | गधे, कुते आदि की आवाजों से उन्हें सुख मिलेगा | चंदनादि शीतल सुगन्धित पदार्थों का लेप नहीं बल्कि विष्ठा, कीचड आदि अत्यंत बदबूदार पदार्थो का लेप लगवा .......  आदि |

सुलस ! उनके लिए तो ऐसे ही उपाय सही साबित होंगे |

सुलस को अभयकुमार पर पूर्ण विश्वास था अतः उसने अभय कुमार के द्वारा निर्दिष्ट सभी विपरीत  उपाय किए, कुत्सित उपाय किए और परिणाम स्वरूप कालशौकरिक की वेदना कुछ शांत हुई |

कालशौकरिक अत्यंत असह्य वेदना से अभिभूत बन मरा और सातवीं नरक में जन्मा |

कथ्य

कृत पापकर्मों के उदय स्वरूप इस जन्म में भी असाध्य, अकल्प्य, नरकगति में भोगने योग्य रोगादि हो सकतेहैं।

जीवहिंसा सबसे बडा पापकर्म है । अठारह पापस्थानकों में से प्रथम पापास्थानक है प्राणातिपात- जीवों में विद्यमान सभी प्राणों का अथवा किसी भी प्राण का अतिपात करना ।

प्रमाद के कारण प्रत्यक्ष रूप से जीवों को काटना, पीटना, उन्हें दुःए पहुंचाना तो हिंसा है ही मगर प्रतीकों में भी कल्पना करके मारना भी हिंसा है ।

मन से की गई हिंसादि रूप पापवृत्तियों से भी पापकर्मों का बंधन होता है ।

निकाचित कर्मों का परिणाम भुगतना ही पडता है । उन कर्मों को टालने के उपाय प्राप्त हो सकते हैं मगर उन उपायों को यथार्थ रूप से किया नहीं जा सकता, ना ही करवाया जा सकता है । पाप-कर्मों के उदय के परिणाम स्वरूप सही उपचार भी गलत हो जाते हैं ।

सत्ता, धन आदि के कारण तुम निश्चित ही किसीको किसी कार्य के लिए विवश बना सकते हो, बाध्य बना सकते हो मगर किसीके मन पर तुम अधिकार नहीं बना सकते हो ।