पहले तीर्थंकर : पहले विधादाता : पहले विधाधर

(संपादक : विजय धर्मधुरंधर सुरी)

इस अवसर्पिणी कालवर्ती चौबीसी में से पहले तीर्थंकर परमात्मा श्री आदिनाथ स्वामी जी दीक्षोपरांत जंगलों में प्रायः कायोत्सर्ग मुद्रा में ही रहते थे । राजकुमार नमि व विनमि परमात्मा के ही साथ रहते थे । दोनों जन सेवा तो बेहद करते थे मगर राज्य की याचना भी अचूक करते रहते थे । परमात्मा साधना मौन पूर्वक ही कर रहे थे ।

एक बार दर्शन और भक्ति के निमित्त आए हुए नागपति धरणेन्द्र देव ने उन्हें देखा; उनकी भक्ति को देखा; और उन पर बहुत-बहुत प्रसन्न हुआ । मगर ज्यों ही उसने दोनों के मुख से राज्य-याचना सुनी तो उसने कहा-- अरे भैया ! ये तो निःसंग, निर्मम और अकिंचन हैं । इनसे कुछ भी मांगना व्यर्थ है । जब इनके पास कुछ है ही नहीं, तो ये क्या देगें ? हां, भरत स्वामी का ही पुत्र है; अब तुम उसे ही स्वामी मानो; उसीकी सेवा करो; उसीसे मांगो और वही तुम्हें देगा । इतना सुनते ही दोनों ने क्रुद्ध होकर कहा—अरे, हमारे स्वामी तो ये ही थे, हैं और रहेंगे । हम अपने स्वामी से ही मांगेंगे, मांग रहे हैं; अन्य किसीसे नहीं । भरत से हम क्यों मांगें ? भरत की सेवा हम क्यों करें ? अरे, कल्पवृक्ष को छोड़कर कांटेदार बबुल की छाया में तो कोई मूर्ख ही बैठना पसंद करता है । चातक प्यासा मर जाता है मगर बादलों के सिवाय किसी भी नदी, सरोवर, समुद्र से जल नहीं मांगता है और न ही किसीका जल पीता है । रही बात कि ये अकिंचन हैं, अतः इनसे मांगना व्यर्थ है तो भी सुन लो-- नदी सूख जाती है, मगर जलार्थी उसे ही खोदते हैं और नदी उन्हें जल देती ही है । अतः हमें ये ही देगें । हमें इन पर पूरा भरोसा है ।

धरणेन्द्र के पास अब कोई जवाब न था । फिर भी कुछ सोचकर उसने कहा--जैसे ये तुम्हारे स्वामी हैं, वैसे ही ये मेरे भी स्वामी हैं । जैसे तुम इनकी दिन-रात सेवा करते हो, वैसे ही मैं भी इनकी सेवा करना चाहता हूँ । जरा एक बात तो बताओ--क्या राजा स्वयं काम करता है ? दोनों ने कहा—नहीं ।  राजा का काम तो उनके सेवक ही करते हैं मगर कहलाता तो यही है कि राजा जी ने किया । सच्चाई भी यही है कि राजा की कृपा के बिना काम होता भी नहीं है । अजी, लड़ते मरते तो सेनाधिपति और सैनिक हैं मगर विजय तो राजा जी की ही कहलाती है । इतना सुनते ही तुरंत नागपति ने कहा-- हम तुम्हें अड़तालीस हजार विधाएं देते हैं । तुम ऐसा ही जानो कि ये विधाएं तुम्हें स्वामी जी ने ही दी हैं । याद रखो--मैं और तुम दोनों इन्हींके सेवक हैं । ये ही हमारे स्वामी हैं । ऐसा कह उसने दोनों को रोहिणी ,प्रज्ञप्ती आदि अड़तालीस हजार विधाएं दे दीं; और कहा--अब तुम दोनों वैत्ताढ्य पर्वत की उत्तरी और दक्षिणी श्रेणी पर जाकर जनपद, नगर और ग्राम बसाओ । उनमें स्वजनों और नागरिकों को बसाओ और तुम न्याय नीतिपूर्वक राज्य का संचालन करो ।   

 

(त्रिषष्टिश्लाकापुरुषचरित्र, पर्व 1)