जैन धर्म और दर्शन में विधा

 

मंत्र और विधा का स्वरूप
 

शायद ही कोई व्यक्ति मंत्र या मंत्र शब्द से अपरिचित हो क्योंकि प्रत्येक धर्मपरंपरा के पास मंत्र थे, मंत्र हैं, और मंत्र रहेंगे । मंत्र आराधना-साधना की विधियां हैं । मंत्र आराधना-साधना के संदर्भ में धूप, दीप, नैवेद्य आदि पदार्थों के अतिरिक्त दिशा, यंत्र, तंत्र, औषधि, आसन, माला, समय, वर्ण, मुद्रा, भावभंगिमा आदि से भी संबंधित उपयोगी सूचन हैं । मंत्र की कार्यकारिणी शक्ति और प्रभावकता बताने वाली अनेकों चामत्कारिक, आश्चर्योत्पादक कथाएं भी पाई जाती हैं । वर्तमान-काल में भी कई व्यक्तियों के मुखों से मंत्र आराधना-साधना के संबंध  में सच्चे-झूठे अनुभव और कल्पनाएं भी सुनी जा सकती हैं ।
 
मंत्र अर्थात् ऐसी व्यवस्थित और निश्चित शब्दावलि; जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने इष्ट से संबंध बना सके; अपने इष्ट भगवान्, भगवती, देव-देवी आदि पराशक्तियों का स्मरण कर सके; उन्हें इच्छित पदार्थ अर्पित कर सके; अपने इच्छित कार्य का निवेदन कर सके । मंत्र अर्थात् मनन करने पर जो त्राण–रक्षण कर सके ऐसी निश्चित शब्दावलि ।

मंत्र एकाक्षरी, द्वयक्षरी, पिण्डाक्षरी और बह्वक्षरी भी होते हैं । ॐ, ऐं, ह्रीं, श्रीं, क्लीं, द्रीं, द्रूँ, ह्र्र्रूँ, ग्लौं आदि एकाक्षरी; नमः, वषट्, स्वाहा, स्वधा, सिद्धं आदि द्वयक्षरी; क्ष्म्ल्वर्युं, वक्ष्म्र्व्युं, हर्ल्व्यूं, इर्म्ल्यूं आदि पिण्डाक्षरी मंत्र हैं । नाम के रूप में भी मंत्र पाए जाते हैं । मंत्र अनेक भाषाओं में पाए जाते हैं । मंत्र का शुरुआती काल आज तक अज्ञात है ।
 
जैन-परंपरा में मंत्र के समान विधाएं भी पाई जाती हैं । माना कि दोनों का अक्षरस्वरूप, शब्द-स्वरूप एक सा ही होता है, मगर दोनों में कुछ मौलिक अंतर हैं, जो कि निम्न हैं--

इत्थी विज्जाSभिहिया, पुरिसो मंतो त्ति तव्विसेसो य ।
विज्जा ससाहणा वा, साहणरहिओ भवे मंतो ।।  

जिसका अधिष्ठायक पुरुष-देव है वह मंत्र है; और जिसकी अधिष्ठायिका स्त्री-देवी है वह विधा  है । मंत्र पाठमात्र से तो विधाएं साधना से सिद्ध होती हैं । मंत्र-सिद्धि के लिए होम, हवन आदि की आवश्यकता नहीं होती; जबकि विधाओं की सिद्धि के लिए होम, हवन आदि की आवश्यकता होती ही है ।

 

जैन-परंपरा में ज्यों मंत्र-विधान अनेकों हैं त्यों विधा-विधान भी अनेकों हैं । जैन साहित्य में चौबीस तीर्थंकर परमात्माओं की एक-एक विधा प्राप्त होती है ।

भक्तामर स्तोत्र में अन्यान्य मंत्र, तंत्र, यंत्र, विधाओं के प्रयोगों के सिवाय प्रमुखरूप से अष्ट- महाविधाओं--सारस्वत, श्रीसंपादिनी, रोगापहारिणी, दोषनिर्णाशिनी, विषापहारिणी, परविधाविच्छेदिनी आदि के विशेष प्रयोग प्राप्त हैं ।

आठ महाप्रभावकों में से ज्यों मंत्र-प्रभावक महापुरुषों का उल्लेख है त्यों ही विधा-प्रभावक महापुरुषों का भी उल्लेख है । प्रत्येक गणधर-भगवंत के शाब्दिक परिचय में विधा-प्रधान और मंत्र-प्रधान होने का उल्लेख प्राप्त है । जैन-इतिहास में आर्य खपुट मुनि जी को विधाचक्रवर्ती मुनि के रूप में विशेष ख्याति प्राप्त है ।

जैन-परंपरानुसार विधाओं और मंत्रों का मूल विधाप्रवाद नामक दसवां पूर्व सूत्र है । श्वेताम्बर-परंपरा में प्रत्येक आचार्य भगवंत जिस सूरि यंत्र-मंत्र की आराधना करते हैं, उसके पांच प्रस्थान हैं । प्रथम तीन प्रस्थानों की अधिष्ठायिकाएं क्रमशः भगवती सरस्वती, त्रिभुवनस्वामिनी और महालक्ष्मी देवी के होने के कारण वे विधास्वरूप हैं जबकि अंतिम दो प्रस्थानों के अधिष्ठायक क्रमशः यक्षराज गणिपिटक और अनंत-लब्धिनिधान, गणधर भगवंत श्री गौतम स्वामी जी के होने के कारण वे मंत्रस्वरूप हैं ।  
 
( विजय धर्म धुरंधर सूरि )