किसीको इतना मजबूर मत बनाओ

 

इतिहासप्रसिद्ध राजगृही नगरी के बाहर एक उपवन था | उसमें बारहमासी फलने-फूलने वाले पुष्पों की अनेकानेक क्यारियां थीं | सबमें सुगंधित फूल देने वाले अलग-अलग पौधे थे |  उपवन के मालिक का नाम था अर्जुन |

उपवन के पास में ही एक मंदिर था । मंदिर में एक यक्ष-प्रतिमा स्थापित थी | यक्ष के हाथ में एक हज़ार पल भारी एक मुद्गर था अतः सभी जन उस यक्ष को मुद्गरपाणि (हाथ में मुद्गर को धारण करने वाले ) यक्ष के रूप में पहचानते थे |

 अर्जुनमाली प्रतिदिन अपनी पत्नी के साथ अपने उपवन में आता था | दोनों जन पंचरंगी पुष्पों को तोड़ते थे,  इकट्ठे करते थे और बहुत ही श्रद्धापूर्वक यक्ष को अर्पित करते थे, यक्ष की पूजा करते थे | शेष हजारों पुष्प अर्जुन राजगृही नगरी में बेच देता था । यक्ष की दोनों पर पूर्ण कृपा थी ।

अर्जुनमाली की पत्नी का नाम था बंधुमती | बंधुमती अत्यंत रूपवती युवती थी | अत्यंत आकर्षक मोहक व्यक्तित्व था उसका |

राजगृही नगरी में सभी रीति से समृद्ध और समर्थ छ: जनों की एक टोली रहती थी | हर तरीके के अच्छे और बुरे काम कर सकती थी | इस टोली के मुख्य व्यक्ति का नाम था ललित, अतः नगरवासी इस टोली को ललितटोली के नाम से ही जानते थे । यह टोली स्वच्छंदी थी, उद्दंडी थी, अपराधी थी मगर राजमान्य थी अतः कोई भी इन्हें कुछ कह नहीं पाता था ।

किसी महोत्सव के दिन यह टोली मुद्गरपाणि यक्ष के मंदिर में आई, बैठी और गपशप कर रहे थे छओं जन | कुछ देर के पश्चात् नित्य-नियम के अनुसार अर्जुनमाली और बंधुमती मंदिर में आये | दोनों ने यक्ष को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और पुष्पों से अर्चना-भक्ति की | उपस्थित टोली ने बंधुमती को देखकर एक निर्णय लिया कि  आज हम इसीको अपना शिकार बनाएँगे | इसी मंदिर में अर्जुनमाली को बांध देंगे और यक्ष तथा अर्जुनमाली के समक्ष ही बंधुमती पर बलात्कार करेंगे | छ:ओं जन योजना के अनुसार दरवाजे के पीछे छुप गए | ज्यों ही दोनों पूजा-अर्चना कर प्रणाम कर रहे थे कि छ:ओं जनों ने सहसा अर्जुनमाली को रस्सियों से बांध दिया । बंधुमती ने छुड़ाने की कोशिश की तो उसे पकड़ लिया और छ:ओं जनों ने उससे सामूहिक बलात्कार किया | बंधुमती ने भी उन को प्रश्रय दिया । अर्जुनमाली  के लिए यह दृश्य असह्य था, मगर वह विवश था | मन ही मन कसमसा रहा था, बंधन तोड़ने के लिए पूरे प्रयास कर रहा था मगर वह बंधनों को न तोड़ पाया और न ही खोल पाया | बस, वो स्वयं को और मुद्गरपाणि यक्ष को कोस रहा था, धिक्कार रहा था | यक्ष को उलाहना देते हुए उसने कहा-- हे यक्ष  ! तू सचमुच में पत्थर का पत्थर ही है | मैंने बचपन से लेकर आज तक तुझे प्रत्यक्ष देव मानकर पूजा, मगर तूने मेरी पूजा, भक्ति का मुझे यह परिणाम दिया | आज मैं तेरे सामने विवश हूं, रो रहा हूं । सच में मैंने जो तेरी पूजा की वो सब राख मे घी ही साबित हुई | यदि मैंने उतने समय तक कुछ और काम किया होता तो अच्छा था ..... ।

उसी समय यक्ष ने विभंगज्ञान से अपने मंदिर में घट रही स्थिति को जाना । यक्ष ने तुरंत अर्जुनमाली के शरीर में प्रवेश किया | परिणाम स्वरूप आविष्ट अर्जुनमाली ने एक अंगडाई ली और उसी क्षण सब बंधन टूट गए । एक झटके में ही उसने यक्ष के हाथ से मुद्गर ले लिया और दुराचारी उन छ:ओं पुरुषों और एक स्त्री यानि अपनी पत्नी बंधुमती पर मुद्गर से प्रहार किया | सातों जन वहीं ढेर हो गए, चूर-चूर हो गए । उसी पल उसने संकल्प किया प्रतिदिन सात जनों-छ पुरुषों और एक स्त्री को मारने का ।  उस दिन से लेकर जब तक अर्जुन छ: पुरुषों और एक स्त्री को मार न देता था तब तक शांत न होता था |

 राजा श्रेणिक को भी अपने नगर में ढिंढोरा पिटवाना पड़ा था कि जब तक अर्जुनमाली छ: पुरुषों और एक स्त्री को न मार दे तब तक कोई भी नगर के दरवाजे से बाहर न निकले |

अंतत: एक दिन यही अर्जुनमाली सुदर्शन शेठ के साथ श्रमण भगवान् श्री महावीर स्वामी जी के समवसरण में पहुंचा | उसने परमात्मा के श्रीमुख से देशना सुनी | दीक्षा ली | आजीवन छट्ठ-छट्ठ तपस्या की | घोर उपसर्ग सहे और  अंत में अर्ध मास की संलेखना कर मुनि अर्जुनमाली ने घाती-अघाती आठों कर्मों का क्षय करके सिद्धत्व को पाया । (उपदेश प्रसाद, स्तंभ-१, व्याखान )

कथ्य

सत्ता, सामर्थ्य आदि सुंदर संयोगों को प्राप्त कर किसीको इतना मजबूर मत बनाओ कि वह आपके प्रतिकार करने के लिए कसमसाए । अपके प्रतिकार के लिए किसी दिव्य शक्ति से मजबूरन प्रार्थना करे और उसे सहायता के लिए आना पडे ।

मूर्ति मात्र पाषाण ही नहीं, बल्कि देव है, देवी है, यक्ष है, व्यंतर है, भगवान् है । हां, शर्त मात्र इतनी कि यदि उसमें विधि पूर्वक, श्रद्धा पूर्वक प्राणप्रतिष्ठा की हो, उसे उसी स्वरूप में माना हो, पूजा हो । फिर तो वे देखते भी हैं, सुनते भी हैं, मानते भी हैं ।

जैन परंपरा मानती है कि देव और नारकी जीवों के समान भूत, पिशाच, य़क्ष, राक्षसादि भी होते हैं । वे किसीके शरीर में प्रवेश भी कर सकते हैं, रह भी सकते हैं, निकल भी सकते हैं । व्यक्ति का इच्छित रीति से प्रयोग भी कर सकते हैं । य़क्षादि की कुछ विशिष्ट शक्तियां होती हैं । वे अपने विशिष्ट अवधि या विभंग ज्ञान से बहुत कुछ जान सकते हैं ।

पाप का घड़ा जरूर फूटता ही है । हां, वह कब फूटेगा और उसे कौन फोडेगा या वह स्वयं फूटेगा यह विशिष्टज्ञानी के लिए निश्चित है मगर सामान्य व्यक्ति के लिए अनिश्चित ।

स्त्रीहत्या, पुरुषहत्या जैसे भयंकर पाप करने वाले क्रूरपरिणामी व्यक्ति चारित्र-धर्म का निरतिचार पालन करके कर्ममुक्त हो सकता है, सिद्धत्व पा सकता है ।