एक घोषणा

 

(संपादक : विजय धर्मधुरंधर सुरी)

 

नमि और विनमि के द्वारा वैताढ्य पर्वत की उत्तरी और दक्षिणी श्रेणी पर संस्थापित क्रमश: 40 और 50 नगरों, अन्य जनपदों तथा ग्रामों में रहने वाले पौरजन, विधाधर मदांध, दुर्विनीत, अनाचारी न बन जाएं अतःविधा संबंधी मर्यादा बताते हुए 

स्वयं धरणेन्द्र देव ने उच्च-ध्वनि से घोषणा की—

 

पहले तीर्थंकर : पहले विधादाता : पहले विधाधर

(संपादक : विजय धर्मधुरंधर सुरी)

इस अवसर्पिणी कालवर्ती चौबीसी में से पहले तीर्थंकर परमात्मा श्री आदिनाथ स्वामी जी दीक्षोपरांत जंगलों में प्रायः कायोत्सर्ग मुद्रा में ही रहते थे । राजकुमार नमि व विनमि परमात्मा के ही साथ रहते थे । दोनों जन सेवा तो बेहद करते थे मगर राज्य की याचना भी अचूक करते रहते थे । परमात्मा साधना मौन पूर्वक ही कर रहे थे ।

शब्द मंत्र समान है । शब्द ही आभूषण है ।

 

संग्राहकः आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय समुद्र सूरीश्वर जी महाराज

अनुवादकः आचार्य श्रीमद् विजय धर्मधुरंधर सूरीश्वर जी महाराज

 

जीवदयाइं रमिज्जइ, इंदियवग्गो दमिज्जइ सयावि

पाप की सजा ऐसी भी

 

दो मित्रों की कहानी है |

एक था राजपुत्र और दूसरा था कसाइपुत्र | राजपुत्र को गर्भावस्था से ही अहिंसा, सत्य, संयम,  तप,  त्याग, न्याय, नीति और कर्तव्यपरायणता के संस्कार मिले थे जबकि कसाइपुत्र को हिंसा,  लूट-पाट, माया, राग-द्वेष, क्रूरता, घृणा के | दोनों में रात और दिन जितना अंतर था मगर दोनों की दोस्ती पक्की थी |

किसीको इतना मजबूर मत बनाओ

 

इतिहासप्रसिद्ध राजगृही नगरी के बाहर एक उपवन था | उसमें बारहमासी फलने-फूलने वाले पुष्पों की अनेकानेक क्यारियां थीं | सबमें सुगंधित फूल देने वाले अलग-अलग पौधे थे |  उपवन के मालिक का नाम था अर्जुन |

उपवन के पास में ही एक मंदिर था । मंदिर में एक यक्ष-प्रतिमा स्थापित थी | यक्ष के हाथ में एक हज़ार पल भारी एक मुद्गर था अतः सभी जन उस यक्ष को मुद्गरपाणि (हाथ में मुद्गर को धारण करने वाले ) यक्ष के रूप में पहचानते थे |

श्रमण भगवान् श्री महावीर स्वामी जी के अभिग्रह

नगरी-- कौशांबी | राजा-- शतानिक महारानी-- मृगवती | मंत्री-- सुगुप्त | मंत्रीपत्नी-- नंदा | श्रेष्ठी-- धनावह | श्रेष्ठिपत्नी-- मूला उपाध्याय-- तथ्यकंदी